करत-करत अभ्यास…
लेखन शुरू करने से पहले सोचते हैं कि शुरुआत कैसे की जाये। पहला क्या अक्षर लिखा जाये। चलो लिख भी लिया तो फिर मन में आशंका रहती है कि क्या यह अच्छा भी लगेगा, कहीं गलत तो नहीं लिख दिया। इस तरह मन में कई विचार आने लगते हैं। अक्सर ऐसा होता भी होगा। फिर कई तो छोड़ देते होंगे, ‘छोड़ क्या लिखना, यह हमारे बस की बात नहीं।’ ऐसा नहीं है, मन में जो विचार पहले आया लिख दो, बस लिखते चलो। यह मत सोचो कि मैं क्या लिख रहा हूं। सुधारने की गुंजाइश तो अक्सर बनी रहती है। जब आप काफी कुछ लिख देते हो तो फिर उसे पढ़ो। शायद तुम्हारी शुरुआत अच्छी हो गई है। हां, मन में डर अवश्य रहता है कि मैं क्या लिख रहा हूं। बस उस डर को तो ही भगाना है। वैसे किसी ने क्या खूब कहा है ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात, सिल पर करत निशान॥’ इस दोहे का अर्थ है कि जब साधारण रस्सी को बार-बार किसी पत्थर पर रगड़ने से निशान पड़ सकता है तो निरंतर अभ्यास से साधारण व्यक्ति भी बुद्धिमान बन सकता है। अभ्यास यानी निरंतरता बनाये रखें।
वैसे किसी को कविता लिखने में बड़ा आनंद आता है। वह मन के भावों को कविता के माध्यम से ढाल देता है। किसी को चित्रांकन का बहुत शौक होता है तो वह मन के चित्रों को रंगों से कागज पर उकेर देता है। किसी को किसी विषय पर लिखना अच्छा लगता है तो उसे शब्दों के माध्यम से अपने विचार लिख देता है। मैं समझता हूं सबके अंदर एक कलाकार रहता है। बस, उसे जगाने का प्रयास करना है। जब आप एक बार लिख देते हैं तो फिर मन को काफी कुछ लिखने की प्रेरणा मिलती है। लो, बातों-बातों में मैंने भी काफी कुछ लिख दिया। खैर, अभी तो शुरुआत की है। आगे काफी कुछ लिखता रहूंगा। मन में जो होगा शब्दों के माध्यम से लिखता रहूंगा। अभी रात के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं। समय ऐसे ही चलता रहेगा। शुभरात्रि!


