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    मत सोच रे बंदे…

    दुनिया में कोविड-19 महामारी क्या आई कि इसने सब कुछ बदल कर रख दिया। आम ज़िंदगी तक प्रभावित हुई। कोरोना की पहली लहर ने रोजी-रोटी का साधन छीन लिया तो लोगों को घरों की तरफ पैदल चलने का अहसास करा दिया। सबकी मंज़िल अपने घर पहुंचने की थी। वही अपना घर, जिसने परिवार को आपस में मिला दिया। वहीं कोरोनाकाल में पुस्तक और कक्षाओं को छोड़कर डिज़िटल और ऑनलाइन तथा सेमिनार  की जगह वेबिनार ने जगह ले ली। लॉकडाउन में आम आदमी की सुबह, दोपहर और शाम बदल गयी। जीवन में मनोरंजन से लेकर अध्ययन तक, चिंतन से लेकर लेखन तक सब कुछ अर्थहीन लगने लगा। लॉकडाउन, लॉकडाउन कर्फ्यू ने…

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    किरायेदार होने के साइड इफेक्ट्स

    जब कैलेंडर पर दिसंबर का महीना और आखिरी सप्ताह फड़फड़ाता था तब हमारा (पति-पत्नी) दिल ज्यादा धड़कने लगता था। रात को नींद उड़ जाती तो दिन में चैन नहीं मिलता था। बात उन दिनों की है जब परिवार सहित नौकरी के लिए शहर आया था। या यूं कह लें कि नौकरी का स्थानांतरण हुआ था। अब जब शहर आये थे तो मकान किराये पर ही लेना पड़ेगा। खैर, बात तो यहां तक ठीक थी। मकान भी मिल गया लेकिन अपनी पसंद को दरकिनार ही कर दिया। अब अपने घर जैसा साफ-सुथरा, हवादार स्वच्छ वातावरण तो मिलने से रहा। बात दिसंबर माह की हो रही है। रात भर रजाई में दुबक…

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    बच्चे तो बच्चे ही हैं…

    परिवर्तन कुदरत का नियम है। अगर ऐसा न हो तो सब कुछ ठहर जायेगा कुछ नया नहीं होगा। आज कोरोना महामारी आई है तो जायेगी भी। लेकिन इस महामारी ने बहुत कुछ बदल दिया तो बहुत कुछ सीखा भी दिया। सीखाने से याद आया। कोरोना के समय ज्यादातर खाने-पीने का सामान घर पर ही बनने लगा। नये-नये पकवान बनने लगे तो नयी चीजें बनने लगीं। खाने-पीने के नाम पर कितनी वैरायटियां हो गई हैं। वह अलग बात है कि इस कोरोनाकाल में जिस घर के सदस्य की नौकरी चली गयी उसके घर में चूल्हा जला भी नहीं। या जला भी तो कैसे चला। अभी उस पर बात नहीं करेंगे। ऐसे…

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    डिज़िटल होता परिवार

    ‘यार … ओके (OK) पर क्लिक कर। अरे बुद्धू तेरे को समझ नहीं आती। मैं क्या कह रहा हूं।’ मां पास आकर बच्चे को समझाती है। ‘बेटा आराम से समझा, उसे नहीं समझ आ रही होगी। अब तेरी तरह एक्सपर्ट थोड़े ही है।’ उत्तर में बच्चा मां से कहता है, ‘मम्मी मैं दोस्त को कब से समझा रहा हूं समझता ही नहीं है। कैसे एप में ज्वाइन होना है।’ पड़ोस में एक बच्चे की बातें सुनकर मुझे हंसी भी आयी और मैं उसकी इन बातों का मजा भी ले रहा था। सोचने लगा कि कोरोना ने आज सबको डिजिटल करने की सोच रखी है। हमें तो कोरोना का अहसानमंद होना…

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    कोरोनाकाल, कुछ खट्टा कुछ मीठा

    कोरोना महामारी 2019 में शुरू हुई तो नाम भी कोविड-19 जुड़ गया। इससे जुड़े लॉकडाउन, कर्फ्यू, अनलॉक, मास्क, सैनेटाइजर, वेंटिलेटर इत्यादि नाम अब जैसे रोजमर्रा के शब्द बन गये हैं। कोरोनाकाल ने एक भयावह स्थिति पैदा कर दी है। रोजगार चले गये। बेरोजगारी बढ़ गयी। रोज कमाने वाला घर बैठा है। मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा-चर्च सब बंद पड़े हैं। अगर कहीं नौकरी बची है तो वहां भी तनख्वाह आधी या थोड़ी मिल रही है। ऐसे काल की किसी ने भी कल्पना नहीं की होगी। लेकिन फिर भी सभी उम्मीद के साथ जी रहे हैं कि एक दिन कोरोना समाप्त होगा। नयी सुबह जरूरी होगी।

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