मत सोच रे बंदे…
दुनिया में कोविड-19 महामारी क्या आई कि इसने सब कुछ बदल कर रख दिया। आम ज़िंदगी तक प्रभावित हुई। कोरोना की पहली लहर ने रोजी-रोटी का साधन छीन लिया तो लोगों को घरों की तरफ पैदल चलने का अहसास करा दिया। सबकी मंज़िल अपने घर पहुंचने की थी। वही अपना घर, जिसने परिवार को आपस में मिला दिया। वहीं कोरोनाकाल में पुस्तक और कक्षाओं को छोड़कर डिज़िटल और ऑनलाइन तथा सेमिनार की जगह वेबिनार ने जगह ले ली। लॉकडाउन में आम आदमी की सुबह, दोपहर और शाम बदल गयी। जीवन में मनोरंजन से लेकर अध्ययन तक, चिंतन से लेकर लेखन तक सब कुछ अर्थहीन लगने लगा। लॉकडाउन, लॉकडाउन कर्फ्यू ने आज़ादी के मूल्य की पहचान दिलाई।
कोरोना की दूसरी लहर आई तो मौतों का आंकड़ा तापमान की तरह बढ़ने लगा। सबका दु:ख-दर्द साझा हुआ। चारों ओर से शोक संदेश ही सुनने को मिलने लगे। जीते जी तो आम आदमी चाहे राशन की हो या बिजली-पानी की लाइन में लगा ही, मरने के बाद भी मुर्दे भी लाइन में लगने लगे। पीड़ित परिवार अपनों के खोने के डर से अपना सब कुछ लुटाने लगा। भविष्य की चिंता छोड़ वर्तमान में ही जीने का आसरा ढूंढ़ने लगा। अपनों के जाने के दर्द ने सभी को अंदर तक हिला दिया। इस भयावह समय में रिश्वतखोरी, लूटने की जद्दोजहद बढ़ने लगी तो प्राइवेट अस्पताल, लैब तक चांदी कूटने लगे। विडंबना देखिये, ऐसे में मानवता तार-तार होने लगी। दु:ख इस बात का हो रहा था कि सत्ता में बैठे लोग तो अपनी जिम्मेवारी जैसे-तैसे निभा ही रहे थे तो विपक्ष में बैठे महापुरुष महामारी की चुनौती से लड़ने के लिए एकसाथ क्या होना, एक-दूसरे की टांगें खींचने में लगे रहे। क्या ऐसे में आपसी मनभेदों को भुलाकर एकसाथ काम नहीं किया जा सकता था? इस महामारी में कुछ नौकरशाहों ने भी अपनी शक्ति का जरूरत से ज्यादा प्रदर्शन किया। जनता त्राहि त्राहि कर रही थीं, उसका दर्द साझा तो क्या करना था उलटा उन्हें दुख ही मिला। सभी अपनी-अपनी रोटियां सेंकने में लगे रहे, किसी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। मानवता बुरी तरह से हांफ गयी। जरा सोचिए, समय जब ऐसे स्वार्थी लोगों से हिसाब मांगेगा तो वे क्या जवाब देंगे।
दुख-दर्द और आसुंओं में डूबा हुआ इंसान आज सब कुछ देख, सुन रहा है लेकिन कहने से डरता है। कहना तो बहुत कुछ चाहता है। बहुत जोर से चिल्लाना, रोना चाहता है। दर्द बयां करना चाहता है लेकिन उसे ऐसा करने से अंदर से कोई रोकता है।
खैर, दु:ख के बाद सुख तो आता ही है। काली अंधेरी रात जितनी गहरी होगी, सुबह की पहली किरण भी उतनी ही खूबसूरत होगी। किसी ने क्या खूब कहा भी है—मत सोच रे बंदे इतना ज़िंदगी के बारे में, जिसने ज़िंदगी दी है उसने भी तो कुछ सोच रखा होगा तेरे बारे में।



3 Comments
Vinayak
Depicts the true current condition👍🏻
Sahanshi Tiwari
It’s a challenging period for us. For a better tomorrow, we have to take precautions.
Stay safe,
Stay healthy!
👍👍
Marina3692
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