सितारा-संस्कृति का मोहपाश और हम…
आज मन ने प्रश्न किया कि सितारा-संस्कृति हमें इतना क्यों आकर्षित करती है। सितारा-संस्कृति अर्थात् बड़े-बड़े नाम वाले सितारों की पार्टियां, आयोजन, विवाह इत्यादि। जब भी किसी बड़े सितारों के कार्यक्रम (इवेंट्स) मीडिया दिखाता है तो हम अपने आप को वहां एक अलग दुनिया में खड़ा पाते हैं। एक रंगीली आभासीय दुनिया में खो जाते हैं। आनंद प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। मध्यम वर्ग इस सपनों की दुनिया में रम जाता है। शायद शारीरिक और मानसिक रूप से दबी हुई इच्छा की पूर्ति कुछ पल के लिए ही सही, पूरी होती दिखती है। प्रत्येक व्यक्ति यह इच्छा पूरा होता भी देखना चाहता है।
खैर, यह बात तो अलग है कि यह सब आम आदमी की किस्मत में नहीं होती है लेकिन कोशिश जारी रहती है। अब इसका दूसरा पहलू भी देखें। ऐसा नहीं लगता कि हम सब मीडिया द्वारा परोसे जा रहे आभासीय उपभोक्ता संस्कृति में जी रहे हैं। मीडिया जिस ओर हमें मोड़ना चाहता है हम उसी ओर बिना कुछ सोचे-समझे आगे बढ़ते जा रहे हैं। विज्ञापन की बात कर लें, ब्रांडेड कंपनी का प्रचार की बात करें यहां तक कि खाने-पीने के समान से लेकर बेड रूम तक मीडिया का प्रचार-प्रसार तक घुस गया है। इसका हमें पता तक भी नहीं चल रहा है। कभी सोचा, क्या इस सितारा-संस्कृति और मीडिया चालित आभासीय उपभोक्ता संस्कृति के मोहपाश से बचना संभव हो पायेगा? क्या हम अपनी वास्तविक जिंदगी में लौटकर वापस आ पायेंगे? आज हमारे जीने के तौर-तरीके सभी कुछ बदल चुके हैं। हम सब एक दिखावा-संस्कृति में जी रहे हैं। अपने को दूसरे से श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। अंदरूनी तौर पर हम खाली होते जा रहे हैं।
वास्तव में किसी को दिखाकर या दिखावे से आपका कोई करीबी नहीं बन जाता है। जबकि सभी इसी भ्रम में जी रहे हैं। यथार्थ में अगर बिना दिखावे के किसी का सच्चा साथी बनकर उसके दुख-सुख में शामिल होने का प्रयास करें तो स्वयं आपको एक असीम सुकून का आनंद प्राप्त होगा। निश्चय ही व्यक्ति आपके दिल के करीब रहेगा। प्यार पर किसी अमीर या गरीब का एकाधिकार नहीं होता। जहां अहम् होगा वहां प्यार नहीं ठहरेगा।
वास्तव में, बात हो रही थी सितारा-संस्कृति की और कैसे मीडिया चालित संस्कृति में जी रहे हैं। सितारा-संस्कृति, मीडिया, विज्ञापन ने हम सबको अपने मोहपाश में बांध रखा है। इस मोहपाश को ही हमने अपनी जिंदगी मान लिया है। इससे बाहर हम निकलना ही नहीं चाहते हैं। अगर एक बार टीवी, मोबाइल, चैनल इन सबको दूर छोड़ दें। सब कुछ छोड़कर खुले आसमान के नीचे दोनों हाथों को ऊपर उठाकर आंख बंद किये कुछ पल के लिए इसमें खो जायें, ठंडी-ठंडी बहती हवा का आनंद लें, स्वच्छंद महसूस करें तो एक अलग अनुभूति का अहसास होगा। आपको लगेगा आज हमने बहुत कुछ पाया है। एक-एक पल जिया है। इसमें किसी की दखलअंदाजी नहीं है। यही जीवन का वास्तविक सुख और मन की शांति है।



5 Comments
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