सेवा को अभिनंदन
पहली जून, 2022. ‘हेलो भाई! पापाजी की तबीयत ठीक नहीं हैं, अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं। तू जल्दी आ जा।’ फोन में ये शब्द किसी को भी विचलित कर सकते हैं। मुझे एक पल कुछ नहीं सूझा कि मैं क्या करूं। शांत मन से दुबारा छोटे भाई को कॉल लगाई तो पता चला कि पिताश्री आईसीयू में भर्ती हैं। मेरा जाना बहुत जरूरी है। मैंने जैसे-तैसे छोटा-मोटा सामान बांधा और सीधा चंडीगढ़ से शिमला की ओर गाड़ी से चल पड़ा।
रास्तेभर कई प्रकार की शंकाएं मन को विचलित कर रही थीं। खैर, चार-पांच घंटे के सफर के बाद सीधा अस्पताल जाना हुआ। जहां पिताश्री पलमोनरी विभाग (श्वास संबंधी) में आईसीयू में भर्ती थे। मुंह में ऑक्सीजन लगी हुई थी। नर्सें उनकी देखभाल कर रही थीं। पहले तो उनका चेहरा देखा। मैंने उनके पैर छुये तो उन्होंने मुझे आंखों ही आंखों से आशीर्वाद दिया। उलटा मुझसे पूछा तू कैसा है। कब आया…। उनके चेहरे पर एक प्रकार की चमक थी कि मेरे दोनों पुत्र मेरे सामने खड़े हैं। वैसे आईसीयू में किसी को अंदर जाने की इजाजत नहीं होती है। केवल एक व्यक्ति ही उनकी देखभाल के लिए बैठ सकता था। वह भी मुंह में मास्क और गाउन पहनकर चौबीस घंटे मरीज की सेवा में जुटे रहना होता था। रातभर तो मैं उनकी सेवा करता, दिन में मेरा भाई और परिवार के अन्य सदस्य बारी-बारी से देखभाल करते। मरीज के साथ आये सभी अटेंडेंट मुंह में मास्क और गाउन पहने इस श्वास संबंधी विभाग में तो कई बार आप किसी को पहचान नहीं सकते कि वास्तव में डाक्टर कौन है और अटेंडेंट कौन है। साफ-सफाई से लेकर पूरी तत्परता के साथ मरीज की देखभाल में लगे रहना मेरे लिए एक नया अनुभव था। खैर, सप्ताहभर तक चले डाक्टरों के चेकअप और नर्सों की सेवा के कारण पिताश्री एकदम ठीक हो गये। डाक्टरों की कुछ हिदायतों के साथ अस्पताल से घर जाने की अनुमति भी मिल गई।
इस दौरान अस्पताल में सप्ताहभर में जो अनुभव किया वह मेरे जीवन में नर्सों के प्रति एक आदरभाव जगा गया। मैंने महसूस किया कि अस्पताल नर्सों की सेवा और उनकी कार्यशैली से ही चलते हैं। हां, डाक्टर का अपना एक अलग स्थान और भूमिका है लेकिन नर्सों का कार्य और बारह-बारह घंटे की ड्यूटी अपने आप में एक मिसाल है। मैंने जो कुछ देखा कि नर्सें हर पल एक-एक मरीज के पास जाकर ग्लुकोज की बोतल, इंजेक्शन, दवाई, ऑक्सीजन की मात्रा कम ज्यादा करना यहां तक कि कई बार मरीज हाथ में लगे ड्रिप भी निकाल देते थे, उन्हें प्यार से दुबारा लगाना। कई बार मरीज मुंह में लगे आक्सीजन से इतना तंग हो जाता था कि उसे निकाल कर फेंक देता। लेकिन नर्सें हमेशा प्यार से उन्हें लगाने के लिए प्रेरित करतीं। कभी किसी को बाबाजी, अंकलजी, आंटीजी, माताजी, बेटेजी, बेटी जैसे प्यारभरे संबोधनों से उन्हें समझातीं। रात हो या दिन की ड्यूटी में तैनात नर्सों को आराम करते तो मैंने देखा नहीं। उनके लिए सेवा ही उनका प्रथम धर्म था। कई बार मरीज के साथ आये अटेंडेंट भी बार-बार नर्सों से पूछते तो उनका जवाब भी बड़े ही प्यार से देतीं।
एक बार जब मैंने नर्स से पूछा कि क्या तुम्हें कभी गुस्सा नहीं आता तो उसका कहना था कि यहां हर प्रकार के मरीज उनके अटेंडेंड आते हैं, उनकी अपनी मजबूरी होती है, हम उनकी मजबूरियों को समझते हैं। इसमें गुस्से करने वाली बात ही नहीं रह जाती। फिर मरीज जल्दी अच्छा हो जाये हम तो यही चाहती हैं। मुझे लगा नर्सें भी तो आखिर इंसान ही है इन्हें भी तो गुस्सा आ सकता है लेकिन उनकी कार्यशैली देखकर उन्होंने मुझे गलत साबित कर दिया। वाकई मरीज के प्रति नर्सों का नरम रुख और देखभाल उन्हें एक अलग ऊंचा स्थान देता है। उनके कार्यों की प्रशंसा को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यहां तक की जो मैंने इस दौरान महसूस किया, समझा उसे भी शब्दों से समझा पाना बहुत मुश्किल है यह तो महसूस कर समझने की जरूरत है। खैर, मेरा उन नर्सों के सेवाकार्य को अभिनंदन!


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