कलाई पर बंधा प्यार
समय के साथ सब कुछ बदलता जा रहा है। पुराने की जगह नया लेता जा रहा है। बाहर से बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन अंदर कहीं कुछ वैसा ही है — या शायद अब वह भी बदलने लगा है। पहले बदलाव सिर्फ बाहरी आवरण तक सीमित थे, अब वे हमारे भावों, हमारे रिश्तों और हमारे जुड़ावों तक पहुंच गए हैं।
वो प्यार, वो भावनाएं, वो अपनापन, वो आंतरिक खुशी और जिज्ञासा — अब पहले जैसे नहीं रहे।
एक समय था जब बहनें रक्षाबंधन के त्योहार का बेसब्री से इंतजार करती थीं। यह इंतजार केवल शगुन या उपहार के लिए नहीं होता था, बल्कि भाई की कलाई पर राखी बांधने की उस आत्मिक संतुष्टि के लिए होता था। उस पल की खुशी, जब वह अपनी थाली में दीया सजाकर, तिलक लगाकर, आरती उतारती थी और भाई की कलाई पर रक्षा का धागा बांधती थी — उस एहसास की कोई कीमत नहीं होती थी।
भाई भी इस दिन का इंतजार करता था। उसे पता होता था कि बहन उसके लिए खास राखी लाई होगी, उसके हाथों से बनी हुई मिठाई खिलाएगी, और ढेर सारा प्यार देगी।
रक्षाबंधन का त्योहार खासकर उन बहनों के लिए और भी खास होता था, जो शादी के बाद अपने मायके से दूर चली जाती थीं। उनके लिए यह त्योहार सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि अपने परिवार से मिलने का बहाना, अपने बचपन की यादों में खो जाने का जरिया होता था। उनकी आंखों में मिलने की खुशी, दिल में उमंग, और हाथों में भाई के लिए राखी — इन सबसे बढ़कर कुछ नहीं होता था।
रक्षाबंधन एक त्योहार जरूर है, लेकिन इसके भीतर एक गहरा भाव छिपा होता है। यह त्योहार सिर्फ धागा बांधने तक सीमित नहीं होता — यह त्योहार जुड़ाव का, भरोसे का, और उस निश्चल प्रेम का प्रतीक है जो एक भाई और बहन के बीच होता है।
लेकिन अब समय बदल गया है। आज राखी भेजने के लिए ऐप्स हैं, डिलीवरी कंपनियां हैं। बहनें खुद जाकर बाजार से राखी चुनने के बजाय मोबाइल पर राखी ऑर्डर कर देती हैं। उसमें न मां-बाप का प्यार होता है, न सास-ससुर की आशीर्वाद भरी नजरें, न वो बातें जो बहनें राखी खरीदते समय किया करती थीं — ‘ये राखी भैया को बांधूंगी, इसे देखकर खुश हो जाएंगे।’
पहले जब राखी घर आती थी, तो पूरा परिवार उसे छूता था, सराहता था। मां-बाप उस राखी को देखकर मुस्कराते थे, आशीर्वाद देते थे। वे त्योहार का महत्व समझाते थे। लेकिन अब सब कुछ एक औपचारिकता बन गया है। न वह अपनापन रहा, न भावनाएं। बस एक ‘डिजिटल रिश्ता’ रह गया है — आभासी, बनावटी और मजबूरी में निभाया गया।
क्या हमने कभी रुककर यह सोचा है कि वो सब कुछ कहां छूट गया? वो अपनापन, वो उमंग, वो इंतजार और वो भावना — सब कुछ आखिर कहां खो गया?

