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किरायेदार होने के साइड इफेक्ट्स

जब कैलेंडर पर दिसंबर का महीना और आखिरी सप्ताह फड़फड़ाता था तब हमारा (पति-पत्नी) दिल ज्यादा धड़कने लगता था। रात को नींद उड़ जाती तो दिन में चैन नहीं मिलता था। बात उन दिनों की है जब परिवार सहित नौकरी के लिए शहर आया था। या यूं कह लें कि नौकरी का स्थानांतरण हुआ था। अब जब शहर आये थे तो मकान किराये पर ही लेना पड़ेगा। खैर, बात तो यहां तक ठीक थी। मकान भी मिल गया लेकिन अपनी पसंद को दरकिनार ही कर दिया। अब अपने घर जैसा साफ-सुथरा, हवादार स्वच्छ वातावरण तो मिलने से रहा।

बात दिसंबर माह की हो रही है। रात भर रजाई में दुबक कर हम दोनों यही चिंता करते कि मकान मालिक अब अगले साल फिर किराया बढ़ाने को कहेगा। बजट तो वैसे भी कभी अपने हाथ की पकड़ में नहीं आया। हर साल फिसल ही जाता था। शायद यह समस्या सभी किरायेदार की होगी। ऊपर से मकान मालिक किरायेदारों को ऐसे सोचते जैसे-तैसे इनको पूरी तरह निचोड़ लिया जाये। सुविधा के नाम तो कुछ मांग ही नहीं सकते। वरना खाली करने का फरमान जारी कर देते हैं। किरायेदारों के जैसे कोई अधिकार ही नहीं है। मकान मालिकों ने कभी स्वयं किरायेदारी वाली फीलिंग नहीं की होगी। वहीं बिजली का मीटर और पानी इकट्ठा हो तो ऊपर से और मुसीबत। ऐसे में हालात में शायद कोई भी रहना नहीं चाहेगा। लेकिन हाय रे! किरायेदार होने के साइड इफेक्ट्स। हर साल मकान मालिक अपनी मर्जी से किराया बढ़ा देता है।  कानून-नियम की बात तो वह कर ही नहीं पाता। मकान मालिक के पास एक ही हथियार होता है—मकान खाली कर दो। क्या करे बेचारा किरायेदार! फिर ऊपर से रात जल्दी घर पहुंचो। ज्यादा देर तक लाइट नहीं जलानी। आपके घर ज्यादा मेहमान नहीं आने चाहिए। शोर-शराबा पसंद नहीं। मकान मालिक जो मर्जी करे उसे कौन रोके। किरायेदार मकान मालिक को बस दुआएं दे सकता है और कर भी क्या सकता है।

जैसे-जैसे जनवरी महीना आता है लोग नये साल की खुशियां मनाते हैं तो किरायेदार अपनी किस्मत को रोता है। खैर, मकान मालिक अपना फरमान सुना देता है कि अब किराया अगले महीने इतना किराया बढ़ा कर देना। किरायेदार भी सिर झुका कर, जो हुक्म मेरे आका! कितना दिल दुखता है उस समय वह वही समझ सकता है जो स्वयं किरायेदार रहा हो। बहुत कम ऐसे मकान मालिक होंगे जो किरायेदार को अपने परिवार की तरह समझते होंगे। उनके दर्द को अपना दर्द समझते होंगे। हां, एक बात जरूर है दूसरे को दुख देने वाला स्वयं कभी सुखी नहीं रह सकता। किसी का विश्वास और उसे अपना बनाने के लिए वर्षों लग जाते हैं। वास्तव में यही असली कमाई है। वरना किरायेदार भी जब मकान छोड़ जाता है तो मकान मालिक को वह इज्जत नहीं मिलती। वह भी यही कहता है—कौन से मुफ्त में रहे हैं, नोट फेंके थे। हालांकि, आज ऑफिस का दिया हुआ मकान है तो महसूस ही नहीं होता कि कभी हम किरायेदार भी थे। आज हमारा परिवार बड़ा हो गया है तो अपने स्वयं का मकान की जरूरत महसूस हो रही है।

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