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कोरोनाकाल, कुछ खट्टा कुछ मीठा

कोरोना महामारी 2019 में शुरू हुई तो नाम भी कोविड-19 जुड़ गया। इससे जुड़े लॉकडाउन, कर्फ्यू, अनलॉक, मास्क, सैनेटाइजर, वेंटिलेटर इत्यादि नाम अब जैसे रोजमर्रा के शब्द बन गये हैं। कोरोनाकाल ने एक भयावह स्थिति पैदा कर दी है। रोजगार चले गये। बेरोजगारी बढ़ गयी। रोज कमाने वाला घर बैठा है। मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा-चर्च सब बंद पड़े हैं। अगर कहीं नौकरी बची है तो वहां भी तनख्वाह आधी या थोड़ी मिल रही है। ऐसे काल की किसी ने भी कल्पना नहीं की होगी। लेकिन फिर भी सभी उम्मीद के साथ जी रहे हैं कि एक दिन कोरोना समाप्त होगा। नयी सुबह जरूरी होगी।

लेकिन कोरोना काल में कुछ काम ऐसे भी हैं जो समय के साथ चल रहे हैं। शादी-ब्याह तो हो रहे हैं। लेकिन किसी प्रकार का धूम-धड़ाका नहीं। बच्चे का जन्म हो रहा है तो उसके नामकरण संस्कार घर तक सीमित हो गया है। इस अवसर पर किसी भी रिश्तेदार को नहीं बुलाया जा रहा। बस फोन पर शुभकामनाएं मिल रही हैं। ऑफिस से कोई सेवानिवृत्त हो रहा है तो विदाई का कोई कार्यक्रम नहीं। कोई मोक्ष को प्राप्त हो रहा है तो उसके साथ चलने वाले कुछ ही लोग। कितना बेबस हो गया है इंसान।

खैर, इन सबके बीच कुछ अच्छा भी हो रहा है। शादी-ब्याह तो हो रहे हैं लेकिन समय और पैसे की बर्बादी रुक गयी है। बच्चे के जन्म के संस्कार में होने वाला खर्च कम हो गया। यह कड़वा सच है लेकिन यह सच भी वाकई में काफी मीठा है। इंसान जिंदगी में पैसा कमाता है तो थोड़ा अपने भविष्य के लिए भी बचाता है। अब तो कोरोना ने एक बहाना भी दे दिया है। इसने किसी को बुरा मानने का मौका भी नहीं दिया है। वैसे किसी ने क्या खूब कहा है कि जिंदगी किसी के रुकने से नहीं रुकती, यह तो निरंतर चलती रहती है, बहती रहती है। अब अगर कोरोना हमारी जिंदगी में घुस गया है तो जाते-जाते कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी जरूर देगा।

 

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