Nature

ओ पालनहारे! तुम्हारे बिना हमारा कौन…

आज ज़िंदा रहने के लिए सबसे बड़ी जद्दोजहद चल रही है। एक-दूसरे को देखकर सभी सहमे हुए हैं। गले और हाथ मिलाना तो दूर की बात अब तो नज़रें मिलाने से भी बच रहे हैं। किसी भी घर में हालात ठीक नहीं है। अच्छी खबर सुनने को कान तरस गये हैं। बस कुछ शब्द जरूर सुनने को मिल रहे हैं—कोरोना, सैनिटाइजर, साफ-सफाई, चिता, अर्थी, दाह-संस्कार, शोकसभा और श्मशान। पहले ये शब्द सुनकर डर लगता था अब तो… हर पल एक नया शोक संदेश सुनने को मिल रहा है। सबके ज़हन में एक ही बात है कि कब तब ऐसे चलेगा।

समाचारपत्र देख लो या खबरें सुन लो। व्हाट्सअप में मैसेजे देख लो कहीं से भी अच्छी बात देखने-सुनने को नहीं मिल रही है। लेकिन एक खबर सुनने और देखने को बहुत अच्छी लगती है कि बहुत सारे लोग इस महामारी की चुनौती से लड़ते हुए अपना मानव धर्म निभा रहे हैं। मन को बहुत सुकून मिलता है। ये लोग मानव सेवा में तन-मन-धन से जुटे हुए हैं। उन्हें देखकर दिल से दुआ निकलती है कि हे प्रभु! इनकी भी रक्षा करना। इन्हें देखकर लगता है इंसानियत जिंदा है। हम घर से बैठकर कुछ न कर सकें लेकिन इनके लिए प्रार्थना तो कर ही सकते हैं।

हालात इतने भयावह हो गये हैं कि आज आपसी रिश्ते भी झूठे साबित हो रहे हैं। मरने के बाद भी अपने रिश्तेदार की मृत देह को छूना तो दूर, देखने से भी कतरा रहे हैं। हालात यहां तक शोचनीय हो गये हैं कि कंधा देने वाला भी कोई नहीं आगे आ रहा है। बेटे की अर्थी को बाप रेड़े पर घसीटता हुआ श्मशान ले जा रहा है। पत्नी अपने पति का संस्कार श्मशान में अकेले कर रही है। किसी घर में एक भी जिंदा इंसान नहीं बचा है। इंसान इतना मजबूर हो गया कि अपने मृतक व्यक्ति का दाह-संस्कार करना तो दूर गंगा में बहा दे रहा है। या फिर म्युनिसिपल वाले आकर पेट्रोल छिड़कर उसका अंतिम संस्कार कर रहे हैं। ऐसे में इंसानियत कहीं भी बची नहीं दिख रही है। कितना बेबस हो गया है इंसान।

वहीं ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने मानवता को ही शर्मसार कर दिया है। मानव सेवा तो क्या करनी, वे अपनी सेवा कराने में जुटे हुए हैं। लूट रहे हैं, लोगों की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। इनके लिए इतना ही कहना काफी है कि ये लोग कुछ अतिरिक्त इकट्ठा नहीं कर रहे हैं। मजबूरी का फायदा उठाकर इकट्ठा किया हुआ धन, बेईमानी, पाप जब पनपेगा तो क्या हासिल होगा। अभी अंदाजा लगाना दूर की बात है।

जब हम छोटे थे तो अपने बड़े बुजुर्गों से सुनते थे कि पाप का घड़ा जब भरता है तो एक दिन फूटता जरूर है। लेकिन उस समय ये बातें केवल कहावती लगती थी। सच में, आज देखने को मिल रहा है। आज जब मानव के पाप का घड़ा फूट गया है तो एक छोटे से वायरस ने, जो नंगी आंखों से भी नहीं देखा जा सकता, पूरी इंसानियत को बता दिया है कि तुम अभी भी इतने बड़े नहीं हुए हो। पहले ठीक तरह से इंसान तो बन लो। आज हमने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी है। अपने धर्म-कर्म, मान-मर्यादा को दांव पर लगा दिया है। आधुनिक ज़माने की आड़ में हमने अपनी संस्कृति को दकियानूसी करार दे दिया। सही अर्थों में हमने अपनी संस्कृति को समझा ही नहीं। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया…’ जैसे श्लोकों को केवल किताब का एक हिस्सा मान लिया। इस पर कभी मनन ही नहीं किया। पृथ्वी, जिसे सनातन संस्कृति में माँ का दर्जा दिया गया है आज उसक दोहन किस हद तक हो रहा है। हमने अपने लाभ के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। इस धरती से जो कुछ भी प्राप्त किया, कभी उसके लिए उसका आभार प्रकट नहीं किया। साक्षात् रूप में उपस्थित सूर्य, चंद्रमा, हवा, पानी, धरती, आकाश का कभी हमने मोल समझा ही नहीं। कभी इनका अहसान माना ही नहीं। पढ़-लिखकर सभी विद्वान तो बन गये। लेकिन सच्चाई से दूर होते चले गये।

आज हमने बहुत कुछ खो दिया है। अपने रूठ कर जा रहे हैं। हमारा नंबर कब लगेगा, पता नहीं। दु:ख इस बात का है कि जो लोग जा रहे हैं, वे सब समय से पहले जा रहे हैं। किसी के भी दु:ख को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। बस, इतना जरूर कहूंगा— इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना। हम चले नेक रस्ते पे…। और अंत में, ओ पालनहारे! तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं… हमरी उलझन, सुलझाओ भगवन्…

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