Nature

सावन को आने दो…

आज जब मैं अपने कंप्यूटर में बैठकर कीबोर्ड पर यह लेख टाइप कर रहा था तो बाहर अचानक बादल गर्जने लगे और थोड़ी देर में झमाझम बारिश होने लगी। शहरों में तो सभी मकान कंक्रीट के हैं। यहां बारिश गिरने का जो दृश्य या आनंद आता है वह नहीं मिलता। खैर, मेरे मकान की निचली मंजिल में बाहर आंगन में लोहे की टीन की छत्त डाल रखी है। जब भी हल्की बारिश शुरू होती है तो छत में गिरती वर्षा की बूंदें एक ध्वनि पैदा करती है जो एक अलग ही आनंद देता है। यूं कह लें बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं।

समय के साथ बारिश की झमाझम या तेज बारिश ने अब वह आनंद देना बंद कर दिया है। लेकिन साथ ही एक डरावना दृश्य पैदा कर दिया है। पहले बारिश पड़ते ही बच्चे बाहर भीगने और नाचने लगते थे। बहते पानी पर कागज की नावें बनाकर उसमें छोड़ते। स्कूल से छुट्टी होते ही भीग कर घर पहुंचने का अपना एक अलग आनंद था। किताबों बस्ते को भीगने से बचाने की नाकाम कोशिश होती थी। पैरों से चलते पानी पर कूद कर पानी के छींटे फैलते उसका एक अलग आनंद था। छत्तों से गिरता पानी एक नया शोर उत्पन्न करता। पेड़-पौधों पर गिरता पानी एक लय उत्पन्न करता। ऐसा लगता प्रकृति नहा रही है। प्रकृति आनंद से झूम रही है। चारों ओर हरियाली ही हरियाली। अधिकतर सायं के समय जब बारिश रुकती तो आसमान और धरती पर गोलाकार में इंद्रधनुष नजर आता। कहीं कोई डर नहीं, भय नहीं। मानो प्रकृति पर इंद्र अपना सब कुछ बारिश के रूप में न्योछावर कर रहे हों। प्रकृति का यौवन लौटता नजर आता। बंजर भूमि भी खिल उठती।

आज जब इतने सालों बारिश तेज बारिश पड़ने लगती है तो सबके मन में कहीं न कहीं एक डर बैठ जाता है। पहाड़ों में तो अब बादल फटना, भूस्खलन, पेड़ों का गिरना अब आम बात हो रही है। वहीं मैदानी इलाकों में बाढ़, पानी का ठहराव, गली-नालियों में बहता पानी का रुकना। बस आदमी प्रकृति से तो दूर हो ही रहा है। अब इन समस्याओं से घिरा रहता है। उसे बारिश नहीं चाहिए। किसी को दफ्तर जाना है, बच्चों को स्कूल जाना है। किसी ने दुकान जाना है तो बारिश उनके लिए समस्या है। कितने स्वार्थी होते चले जा रहे हैं। सावन का महीना आया है तो बारिश तो होगी ही। हमने अपने आपको प्रकृति से दूर रहने का सोच लिया है। बस, हमें अपना देखना है।

कभी सोचा कि हम ऐसा क्यों सोच रहे हैं। जिस प्रकृति ने सब कुछ दिया है उस प्रकृति से दूरी हमारी सबसे बड़ी भूल है। आज भीगना भूल गये। बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि बारिश में भीगना भी जरूरी है। यह आपके शरीर के अंदर की कई बीमारियों को दूर करती है। लेकिन हमने अपने आपको इतना सेंस्टिव बना दिया है कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होती जा रही है। बच्चे भीग न जायें, कहीं जुकाम या बुखार न हो जाये। अब क्या हो रहा है, थोड़ा सा भीगने पर वे ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं।

खैर, इतना याद रखो जितना प्रकृति से दूरी बनाएंगें हम उतने कमजोर रहेंगे। प्रकृति का आनंद प्रकृति के साथ रहकर ही लिया जा सकता है। बंद कमरों के अंदर बाहर का दृश्य तो देखा जा सकता है लेकिन सचमुच का आनंद तो प्रकृति में ही मिलेगा। एक बार विचार कीजिएगा।

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