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    बड़ा आशियाना, छोटा दायरा

    अक्सर देखा होगा कि बड़े-बड़े मकानों के अंदर सजावटी सामान रखा होता है जो देखने में तो अच्छे लगते ही हैं लेकिन हल्का-सा धक्का लगने पर नीचे गिरने पर चकनाचूर हो जाते हैं। महंगा सजावटी सामान मेहमान या आने वालों को दिखाने के लिये ही होता है। घरवाले तो रोज ही देखते हैं। शायद देख-देखकर मन ही मन सुकून भी पाते होंगे। खैर, कौन नहीं चाहेगा कि उसके आशियाने में अच्छा सजावटी सामान भरा हो। देखने वाले उसकी तारीफ में कसीदे कसें। आप उस सामान की कीमत या कहां से मंगाया कैसे मुश्किल से आया इत्यादि का ब्योरा देने में जुट जाते हैं।

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    विद्यालय को नमन

    आज मन में विचार आया कि हम आज तक अपनी जिंदगी में स्कूल (ज्ञान का मंदिर) कितने दिन, साल तक गये होंगे? उससे पहले लोअर केजी, एलकेजी फिर प्रथम कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक तो दस-बारह साल हो गये। उसके बाद स्कूल, कॉलेज फिर विश्वविद्यालय तक का सफर। चाहे स्कूल हो, कॉलेज हो या यूनिवर्सिटी, सब ज्ञान के मंदिर ही हैं। यानी कम से कम बीस से पच्चीस साल तो गये ही होंगे। कुछ इससे ज्यादा हो सकते हैं। खैर, यह तो रही स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय की बात। उसके बाद जब आपके भी बच्चे हुए तो उनके साथ आप फिर स्कूल गये होंगे। कभी पीटीएम, कभी फीस के…

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    करत-करत अभ्यास…

    लेखन शुरू करने से पहले सोचते हैं कि शुरुआत कैसे की जाये। पहला क्या अक्षर लिखा जाये। चलो लिख भी लिया तो फिर मन में आशंका रहती है कि क्या यह अच्छा भी लगेगा, कहीं गलत तो नहीं लिख दिया। इस तरह मन में कई विचार आने लगते हैं। अक्सर ऐसा होता भी होगा। फिर कई तो छोड़ देते होंगे, ‘छोड़ क्या लिखना, यह हमारे बस की बात नहीं।’ ऐसा नहीं है, मन में जो विचार पहले आया लिख दो, बस लिखते चलो। यह मत सोचो कि मैं क्या लिख रहा हूं। सुधारने की गुंजाइश तो अक्सर बनी रहती है। जब आप काफी कुछ लिख देते हो तो फिर उसे…

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