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जहां भाव, वहीं भगवान
एक बार वृंदावन के एक भव्य मंदिर में, अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर एक संत श्री बांके बिहारी जी के चरणों का दर्शन कर रहे थे। उनका मन प्रभु के दर्शन में इतना लीन था कि वे भावविभोर होकर स्वयं को भूल चुके थे। उनकी आंखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे, और होंठों पर एक मधुर भाव अनायास ही फूट पड़ा— ‘श्री बिहारी जी के चरण कमल में नयन हमारे अटके, नयन हमारे अटके…’ भक्तिरस से सराबोर वह भाव मंदिर में गुंजायमान हो उठा। उसी समय वहाँ एक सामान्य भक्त भी खड़ा था। वह कोई ज्ञानी, साधक या कवि नहीं था—परंतु उस संत का प्रेममय गान उसके हृदय में…
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सेवा को अभिनंदन
पहली जून, 2022. ‘हेलो भाई! पापाजी की तबीयत ठीक नहीं हैं, अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं। तू जल्दी आ जा।’ फोन में ये शब्द किसी को भी विचलित कर सकते हैं। मुझे एक पल कुछ नहीं सूझा कि मैं क्या करूं। शांत मन से दुबारा छोटे भाई को कॉल लगाई तो पता चला कि पिताश्री आईसीयू में भर्ती हैं। मेरा जाना बहुत जरूरी है। मैंने जैसे-तैसे छोटा-मोटा सामान बांधा और सीधा चंडीगढ़ से शिमला की ओर गाड़ी से चल पड़ा। रास्तेभर कई प्रकार की शंकाएं मन को विचलित कर रही थीं। खैर, चार-पांच घंटे के सफर के बाद सीधा अस्पताल जाना हुआ। जहां पिताश्री पलमोनरी विभाग (श्वास संबंधी) में…
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सितारा-संस्कृति का मोहपाश और हम…
आज मन ने प्रश्न किया कि सितारा-संस्कृति हमें इतना क्यों आकर्षित करती है। सितारा-संस्कृति अर्थात् बड़े-बड़े नाम वाले सितारों की पार्टियां, आयोजन, विवाह इत्यादि। जब भी किसी बड़े सितारों के कार्यक्रम (इवेंट्स) मीडिया दिखाता है तो हम अपने आप को वहां एक अलग दुनिया में खड़ा पाते हैं। एक रंगीली आभासीय दुनिया में खो जाते हैं। आनंद प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। मध्यम वर्ग इस सपनों की दुनिया में रम जाता है। शायद शारीरिक और मानसिक रूप से दबी हुई इच्छा की पूर्ति कुछ पल के लिए ही सही, पूरी होती दिखती है। प्रत्येक व्यक्ति यह इच्छा पूरा होता भी देखना चाहता है। खैर, यह बात तो अलग है…
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मत सोच रे बंदे…
दुनिया में कोविड-19 महामारी क्या आई कि इसने सब कुछ बदल कर रख दिया। आम ज़िंदगी तक प्रभावित हुई। कोरोना की पहली लहर ने रोजी-रोटी का साधन छीन लिया तो लोगों को घरों की तरफ पैदल चलने का अहसास करा दिया। सबकी मंज़िल अपने घर पहुंचने की थी। वही अपना घर, जिसने परिवार को आपस में मिला दिया। वहीं कोरोनाकाल में पुस्तक और कक्षाओं को छोड़कर डिज़िटल और ऑनलाइन तथा सेमिनार की जगह वेबिनार ने जगह ले ली। लॉकडाउन में आम आदमी की सुबह, दोपहर और शाम बदल गयी। जीवन में मनोरंजन से लेकर अध्ययन तक, चिंतन से लेकर लेखन तक सब कुछ अर्थहीन लगने लगा। लॉकडाउन, लॉकडाउन कर्फ्यू ने…
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ओ पालनहारे! तुम्हारे बिना हमारा कौन…
आज ज़िंदा रहने के लिए सबसे बड़ी जद्दोजहद चल रही है। एक-दूसरे को देखकर सभी सहमे हुए हैं। गले और हाथ मिलाना तो दूर की बात अब तो नज़रें मिलाने से भी बच रहे हैं। किसी भी घर में हालात ठीक नहीं है। अच्छी खबर सुनने को कान तरस गये हैं। बस कुछ शब्द जरूर सुनने को मिल रहे हैं—कोरोना, सैनिटाइजर, साफ-सफाई, चिता, अर्थी, दाह-संस्कार, शोकसभा और श्मशान। पहले ये शब्द सुनकर डर लगता था अब तो… हर पल एक नया शोक संदेश सुनने को मिल रहा है। सबके ज़हन में एक ही बात है कि कब तब ऐसे चलेगा। समाचारपत्र देख लो या खबरें सुन लो। व्हाट्सअप में मैसेजे…








