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मत सोच रे बंदे…
दुनिया में कोविड-19 महामारी क्या आई कि इसने सब कुछ बदल कर रख दिया। आम ज़िंदगी तक प्रभावित हुई। कोरोना की पहली लहर ने रोजी-रोटी का साधन छीन लिया तो लोगों को घरों की तरफ पैदल चलने का अहसास करा दिया। सबकी मंज़िल अपने घर पहुंचने की थी। वही अपना घर, जिसने परिवार को आपस में मिला दिया। वहीं कोरोनाकाल में पुस्तक और कक्षाओं को छोड़कर डिज़िटल और ऑनलाइन तथा सेमिनार की जगह वेबिनार ने जगह ले ली। लॉकडाउन में आम आदमी की सुबह, दोपहर और शाम बदल गयी। जीवन में मनोरंजन से लेकर अध्ययन तक, चिंतन से लेकर लेखन तक सब कुछ अर्थहीन लगने लगा। लॉकडाउन, लॉकडाउन कर्फ्यू ने…
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ओ पालनहारे! तुम्हारे बिना हमारा कौन…
आज ज़िंदा रहने के लिए सबसे बड़ी जद्दोजहद चल रही है। एक-दूसरे को देखकर सभी सहमे हुए हैं। गले और हाथ मिलाना तो दूर की बात अब तो नज़रें मिलाने से भी बच रहे हैं। किसी भी घर में हालात ठीक नहीं है। अच्छी खबर सुनने को कान तरस गये हैं। बस कुछ शब्द जरूर सुनने को मिल रहे हैं—कोरोना, सैनिटाइजर, साफ-सफाई, चिता, अर्थी, दाह-संस्कार, शोकसभा और श्मशान। पहले ये शब्द सुनकर डर लगता था अब तो… हर पल एक नया शोक संदेश सुनने को मिल रहा है। सबके ज़हन में एक ही बात है कि कब तब ऐसे चलेगा। समाचारपत्र देख लो या खबरें सुन लो। व्हाट्सअप में मैसेजे…
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किरायेदार होने के साइड इफेक्ट्स
जब कैलेंडर पर दिसंबर का महीना और आखिरी सप्ताह फड़फड़ाता था तब हमारा (पति-पत्नी) दिल ज्यादा धड़कने लगता था। रात को नींद उड़ जाती तो दिन में चैन नहीं मिलता था। बात उन दिनों की है जब परिवार सहित नौकरी के लिए शहर आया था। या यूं कह लें कि नौकरी का स्थानांतरण हुआ था। अब जब शहर आये थे तो मकान किराये पर ही लेना पड़ेगा। खैर, बात तो यहां तक ठीक थी। मकान भी मिल गया लेकिन अपनी पसंद को दरकिनार ही कर दिया। अब अपने घर जैसा साफ-सुथरा, हवादार स्वच्छ वातावरण तो मिलने से रहा। बात दिसंबर माह की हो रही है। रात भर रजाई में दुबक…
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प्रकृति में सुकून…
कोरोना ने ऐसी जिंदगी बदली की जो जहां खड़ा था, उसे पीछे धकेल दिया। खैर, लंबे समय के बाद शिमला जाना हुआ। खूबसूरत पहाड़ी प्रदेश में पहुंचकर ऐसा लगा जैसे सारे बंधन तोड़कर खुली हवा में सांस ले रहा हूं। शरीर में एक नयी ऊर्जा का संचार हुआ। खुला-खुला वातावरण तो थोड़ा-थोड़ा ठंड का अहसास। फरवरी का दूसरा सप्ताह था। बर्फ तो कहीं नजर नहीं आयी लेकिन जो सुकून इस पहाड़ों में मिला, उसे शब्दों में बयां तो बिल्कुल नहीं किया जा सकता। बहती हुई हवा और साथ में सांय-सांय करते ऊंचे-ऊंचे देवदार के वृक्ष एक अलग आनंद का अहसास करा रहे थे। पूरा वातावरण अलग संगीतमय तान छेड़ रहा…
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बच्चे तो बच्चे ही हैं…
परिवर्तन कुदरत का नियम है। अगर ऐसा न हो तो सब कुछ ठहर जायेगा कुछ नया नहीं होगा। आज कोरोना महामारी आई है तो जायेगी भी। लेकिन इस महामारी ने बहुत कुछ बदल दिया तो बहुत कुछ सीखा भी दिया। सीखाने से याद आया। कोरोना के समय ज्यादातर खाने-पीने का सामान घर पर ही बनने लगा। नये-नये पकवान बनने लगे तो नयी चीजें बनने लगीं। खाने-पीने के नाम पर कितनी वैरायटियां हो गई हैं। वह अलग बात है कि इस कोरोनाकाल में जिस घर के सदस्य की नौकरी चली गयी उसके घर में चूल्हा जला भी नहीं। या जला भी तो कैसे चला। अभी उस पर बात नहीं करेंगे। ऐसे…










