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किरायेदार होने के साइड इफेक्ट्स
जब कैलेंडर पर दिसंबर का महीना और आखिरी सप्ताह फड़फड़ाता था तब हमारा (पति-पत्नी) दिल ज्यादा धड़कने लगता था। रात को नींद उड़ जाती तो दिन में चैन नहीं मिलता था। बात उन दिनों की है जब परिवार सहित नौकरी के लिए शहर आया था। या यूं कह लें कि नौकरी का स्थानांतरण हुआ था। अब जब शहर आये थे तो मकान किराये पर ही लेना पड़ेगा। खैर, बात तो यहां तक ठीक थी। मकान भी मिल गया लेकिन अपनी पसंद को दरकिनार ही कर दिया। अब अपने घर जैसा साफ-सुथरा, हवादार स्वच्छ वातावरण तो मिलने से रहा। बात दिसंबर माह की हो रही है। रात भर रजाई में दुबक…
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प्रकृति में सुकून…
कोरोना ने ऐसी जिंदगी बदली की जो जहां खड़ा था, उसे पीछे धकेल दिया। खैर, लंबे समय के बाद शिमला जाना हुआ। खूबसूरत पहाड़ी प्रदेश में पहुंचकर ऐसा लगा जैसे सारे बंधन तोड़कर खुली हवा में सांस ले रहा हूं। शरीर में एक नयी ऊर्जा का संचार हुआ। खुला-खुला वातावरण तो थोड़ा-थोड़ा ठंड का अहसास। फरवरी का दूसरा सप्ताह था। बर्फ तो कहीं नजर नहीं आयी लेकिन जो सुकून इस पहाड़ों में मिला, उसे शब्दों में बयां तो बिल्कुल नहीं किया जा सकता। बहती हुई हवा और साथ में सांय-सांय करते ऊंचे-ऊंचे देवदार के वृक्ष एक अलग आनंद का अहसास करा रहे थे। पूरा वातावरण अलग संगीतमय तान छेड़ रहा…
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बच्चे तो बच्चे ही हैं…
परिवर्तन कुदरत का नियम है। अगर ऐसा न हो तो सब कुछ ठहर जायेगा कुछ नया नहीं होगा। आज कोरोना महामारी आई है तो जायेगी भी। लेकिन इस महामारी ने बहुत कुछ बदल दिया तो बहुत कुछ सीखा भी दिया। सीखाने से याद आया। कोरोना के समय ज्यादातर खाने-पीने का सामान घर पर ही बनने लगा। नये-नये पकवान बनने लगे तो नयी चीजें बनने लगीं। खाने-पीने के नाम पर कितनी वैरायटियां हो गई हैं। वह अलग बात है कि इस कोरोनाकाल में जिस घर के सदस्य की नौकरी चली गयी उसके घर में चूल्हा जला भी नहीं। या जला भी तो कैसे चला। अभी उस पर बात नहीं करेंगे। ऐसे…
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डिज़िटल होता परिवार
‘यार … ओके (OK) पर क्लिक कर। अरे बुद्धू तेरे को समझ नहीं आती। मैं क्या कह रहा हूं।’ मां पास आकर बच्चे को समझाती है। ‘बेटा आराम से समझा, उसे नहीं समझ आ रही होगी। अब तेरी तरह एक्सपर्ट थोड़े ही है।’ उत्तर में बच्चा मां से कहता है, ‘मम्मी मैं दोस्त को कब से समझा रहा हूं समझता ही नहीं है। कैसे एप में ज्वाइन होना है।’ पड़ोस में एक बच्चे की बातें सुनकर मुझे हंसी भी आयी और मैं उसकी इन बातों का मजा भी ले रहा था। सोचने लगा कि कोरोना ने आज सबको डिजिटल करने की सोच रखी है। हमें तो कोरोना का अहसानमंद होना…
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कोई लौटा दे बीते हुए दिन
यह सच है कि बीते हुए दिन वापस तो नहीं आ सकते। लेकिन उन यादों को जरूर ताजा किया जा सकता है। हमारा छोटा-सा परिवार। हम दोनों भाइयों की शादी के बाद परिवार बड़ा हो गया। बहन भी शादी के बाद ससुराल चली गई। मैं भी रोजगार के चक्कर में बाहर चला गया। अब घर जाना साल में एक बार ही हो पाता है। वह भी तब जब बच्चों की स्कूल में जून महीने में छुट्टियां हो जाती हैं। तब वही पहाड़ और गर्मी से राहत के लिए अपना मकान याद आता है। अपना दो मंजिला मकान आज भी है। शायद मकान को बने सौ साल से ऊपर हो गये…











